सोमवार, 30 जनवरी 2017

तिरंगा और जवानी

दो किरदारों की है, ये कहानी,
एक है तिरंगा और एक है जवानी।

पूछे तिरंगा जवानी से,
है क्यूँ तू मेरी दीवानी ?
बोली जवानी,
शौक तुझे है, शिखरों पे लहरने का,
और महफूज़ है तू, उन शिखरों पे,
क्योंकि मेरी फ़ितरत में, है बलिदानी !!

पूछे तिरंगा, जवानी से,
क्यूँ बिछड़ कर दुनियादारी से,
बँधी हो मोहब्बत हमारी से ?

बोली जवानी, सुनो ऐ रंगीले,
लहराते हो जब तुम, हवाओं में,
जूनून फैलाते हो ऐसा, फ़िज़ाओं में,
सब मस्तक नम हो जाते हैं,
और हम बस तुझ में खो जाते हैं !!

हैरान तिरंगा, कहे जवानी से,
क्यों इतनी मेरी, है परवाह तुझे ?
जब सारा जग सो जाता है,
जाने क्यूँ?, चैन तेरा खो जाता है,
रात-दिन देखा है तुझे,
इर्द-गिर्द कंटीली तारों के,
तेरे अपने, तेरे सपने,
क्यूँ लगते हैं, पार सितारों के?

हँस दी जवानी और बोली,
ऐ मेरे भोले हमदम,
पहनी थी जिस दिन मैंने, ये वर्दी,
मालूम थी मुझे,
जैसलमेर की गर्मी और सियाचिन की सर्दी,
और हाँ,
तू अपनों की कहता है, मेरे सपनों की कहता है,
तो सुनो ऐ तिरंगे,
माना, मेरी वो नन्ही गुड़िया,
मेरे पास नहीं है,
साँसें तोड़ती माँ से भी,
मिलने की, आस नहीं है,
मेरे खाली और भरे पेट में,
अंतर, कुछ ख़ास नहीं है !
गम नहीं, मेरे अपने मुझे जैसे भी आंक लें,
पर मज़ाल नहीं, इस ओर से, या उस ओर से,
कोई बुरी नज़र से तुझे झाँक ले !!

कसम है मुझको, ना देंगे झुकने तुझको,
जब तक बदन में होश है,
साँसे रुकें तो परवाह नहीं, क्योंकि,
आख़िर में मेरे महबूब, तेरा आग़ोश है !!
 
दो किरदारों की है, ये कहानी,
एक है तिरंगा और एक है जवानी।।
------------------------
("जवानी" ~ "फौजी ")
----------------
Click here to watch the video on Youtube
-------
लेखनी:
अजय चहल 'मुसाफ़िर',
चेन्नई, भारत
----------
(Recited at IIT Madras on the occasion of Martyrs' Day 2017)




शुक्रवार, 23 दिसंबर 2016

The Eyeful

Realized after a jerk and a biting,
Your vivid calmness is so inviting...

Lost in the charm of your eyes,
A treasure of unpacked smiles...

You are leading me on a slippery lane,
From Far?, ohh..remotely driving insane...

Where unfaltering is not an option,
I am drenched,
beyond my capacity of absorption...

Supple back this covert deception,
Am failing, betraying my perception...

Phooey...
-----
Penciled by:
Ajay Chahal 'Musafir'
Chennai, Bharat


सोमवार, 31 अक्टूबर 2016

Now

Flipping through the past,
say my past, say recent past.

Happened to meet myself, on a lake,
the boat, the water, and me, looks fake?

fake, why?, that I know not,
Though real was water & boat.

That's not me, I can't be there anymore,
Water has flown, leaving behind the shore.

Every moment frozen in the past,
Not even it was first, but will even be last.

Struggle not, with the present, but adapt,
As this shall too pass, the reason to rapt.

Change is the only permanent option,
Real is NOW, as past is ready for adoption.

Om Shanti. Shanti. Shanti.

-----

Penciled by:
Ajay Chahal 'Musafir'
Chennai, Bharat


सोमवार, 17 अक्टूबर 2016

पहला और आखिरी प्यार

मेरा पहला प्यार था, मेरी माँ,
जो आज भी परिभाषा है, मेरे शरीर की,
जिसने, ना केवल शब्द से परिचय कराया,
सिखायी भी उसने, कहनी बातें ज़मीर की ।।

मेरा आखिरी प्यार है, मेरी पत्नी,
संतान देकर वैधता बढ़ाई, इस नश्वर शरीर की,
ना केवल हर शब्द की कीमत बताई,
सिखायी भी उसने, समझनी बातें जमीर की ।।

माना मोहब्बत में मुश्किल नहीं, पर आसां भी नहीं,
दिनभर की मशक्कत के बाद, रातों की नींद टालना,
जरा सी सिसकी पे, वो हिलाती रही मेरा पालना,
मेरी रफ़्तार के सपने थे, उसकी आँखों में,
सीख रहा था मैं जब, पहला कदम संभालना ।।

कुछ ख्याल बस खुशनुमा लगते हैं, पर वो होते नहीं,
जैसे, उसका अंदाज-ऐ-अलविदा,
मुस्काती है वो, पर मैं कैसे मानूँ, नैन उसके रोते नहीं ।
वो ढूंढती है मुझमें, उसका पहला नायक, उसका पिता,
पूरा है उसका संसार यहाँ, पर अधूरी देखा है मैंने उसे,
जब भी पुकारता है वो साया, "कुछ दिन मेरे संग बिता" ।।

कुछ जिद्दें बड़ी खूंखार होती हैं और एकदम पक्की भी,
बोली, "मेरे जोड़, साथ रहे हैं छोड़", एक सहेली ला दे,
मैं दौड़ गया, पर सवाल जिन्दा छोड़ गया,
देखा, उस रोज़, दाँत ही नहीं, वो पीसती रही चक्की भी ।।

लाया था मैं उसकी सहेली, पर उनका रिश्ता है एक पहेली,
मोहब्बत तो है दोनों और से, पर उलझन है शोर से,
बंटवारा ना हो, मेरे दिल के टूकड़ों का, गर,
दुरुस्त रहे पहली मोहब्बत और आखिरी रहे नयी नवेली ।।

सुना है, कोई कभी नहीं भूलता, अपने किसी भी प्यार को,
टूटती सांसों से कहीं, लगाव ना हो जाये इंतज़ार को,
इसलिये ज़ारी रख, मुसाफ़िर,
सत्कार पहले प्यार को और इज़हार आखिरी प्यार को ।।

-----------
Video Link:
YouTube: पहला और आखरी प्यार - अजय चहल
------------
लेखनी: अजय चहल 'मुसाफ़िर'
17 अक्टूबर 2016
चेन्नई, भारत


बुधवार, 12 अक्टूबर 2016

शक़

'शक़' है, वो शब्द, रे मुसाफ़िर !
जिसने कितने ही दिल हैं तोड़े,
जाने किस के रिश्ते, किस से जोड़े,
गगनभेदी बाज़ों के पंख मरोड़े,
कितने ही परिवारों के हैं, पेड़ सुखाये ।
खींच लकीरें कागज़ पर, दो देश बनाये ।।

जिस दिन आया था, वो शब्द, पास तुम्हारे,
पहले जैसे ना रहे, अहसास हमारे,
बदले बदले लगने लगे थे अब, तुम्हें रंग मेरे,
फ़ना हुए वो सारे पल, बीते जो संग तेरे,
हीरा था मैं, पर बन रहा था पत्थर अब ।
गैरों के इशारों पर, भूल गए तुम कसमें सब ।।

थामा था जब हमने हाथ, गवाह बने थे यार सारे,
दुनिया बनी थी मेरी तुम, हम बने संसार तुम्हारे,
पर जब से उसकी दस्तक हुई,
सहलाने की बारी गई, तेरी मुठ्ठी में आये, बाल हमारे ।
बेगाने तो सब बच गए, अपने थे, आये पेशी पे सारे ।।

जिस आँगन में हर-दम, हमारी धमा-चौकड़ी होती थी,
परिंदों और इंसानों को छका, माँ खाली पेट सोती थी।
मैंने सुना है, किसी रोज़, इक शब्द की यहाँ मार हुई,
ठीक वैसे ही जैसे, अयोध्या में माँ सीता भी तार हुई।
सूखा नीम सबूत है, सच्चे रिश्तों की यहाँ हार हुई ।।

उसी शब्द से, मज़हबों में हमारे, थी आयी दरार,
कागज़ पे थी लकीरें, फिर भी लाखों ना कर पाये पार ।
अब पड़ोसी है, पर तंग-दिल है, रोज़ हंगामा करता है,
अजीब मुल्क हैं हम, इंतज़ार में, क्या जमाना करता है ?
जो बुज़दिल न थे, वो उस पार जवाब दे आये थे,
पर शक़ के मरीज़ों की खुराक, वो लाशें वहीं भूल आये थे ।।

हर डगर तक थी पहुँच, हर रस्ता आसान था,
सपनों की पगडण्डी पे, रफ़्तार का तूफ़ान था,
मस्त था, सशक्त था, नहीं पता था मुझे हार का,
दबे पांव वो शब्द आया, धीमा असर, उसकी मार का ।
मैं ढेर हुआ, वो शेर हुआ, और फिर ना कभी सवेर हुआ ।।

-------
ये शब्द, 'शक़', है गुनाहगार।
उम्मीदों का, सपनों का, अपनों का ।
प्यार का, यार का, परिवार का ।
बचपन का, मुस्कान का, मकान का ।
मासूम जान का, मान का, सीमा पर जवान का ।
इंसान का, भगवान का, मज़हबी ईमान का,
मेरे देश का, संत के भेष का, गरीब के वेश का ।
है गुनाहगार, ये शब्द, 'शक़' ।।

----------
 'मुसाफ़िर' आभारी है 'श्रीशैलन (விவசாயி)' के 'शाब्दिक-प्याऊ' का !!
----------
Listen it here:
https://soundcloud.com/ajay-chahal/shaq
----------

लेखनी: अजय चहल 'मुसाफ़िर'
12 अक्टूबर 2016
चेन्नई, भारत

बुधवार, 5 अक्टूबर 2016

लबरेज

दिल कहता है, कह दूं तुम्हें, कुछ ऐसा,
महसूस मेरी धड़कन को तू करे, अपने जैसा ।।

इक शब्द भी ना लगे, ये सब कहने में,
सुकून मिले मुझे बस, तेरे पास रहने में ।।

तुम भी कहो, ना कुछ, तो भी मैं समझूँ सब,
अनकहे को सुनने की, लगन लगी है अब ।।

आज भले ढल जाये सूरज, पर रहे, ये साँझ यहीं,
लबरेज मौन है दरिया सा, बहने दे इसे, अब बांध नहीं ।।

-------------------
{लबरेज़ = लबालब (Brimful, Overflowing)}
-------------------
ये कविता हमारे परिवार में जुड़े एक नए शिशु (सदस्य) को समर्पित है। उसकी भाषा अभी तक सिर्फ 'मौन' है।
-------------------
Listen it here:
https://soundcloud.com/ajay-chahal/labrez
-------------------
इसे उर्दू में यहाँ पढ़ें:
https://musaafiraana.blogspot.in/2017/08/labrez.html
--------------------
लेखनी: अजय चहल 'मुसाफ़िर'
5 अक्टूबर 2016
चेन्नई, भारत

शनिवार, 17 सितंबर 2016

सूरज

देखो सूरज है आ रहा, अँधियारा है अब जा रहा,
देखो सूरज है आ रहा ।।
जब यहाँ प्रकाश ना था, कौन हृदय निराश ना था,
काले बादल घनघोर थे, भगदड़ मचाए सब चोर थे ।।
उन नकाबी इरादों पे, पानी-सा अब फिर गया है,
उम्मीदों का आंगन जो, रौशनी से घिर गया है ।।
उस अँधेरे दौर में, अपनों का बस आभास था,
हर आस्तीन का सांप, बन बैठा तब ख़ास था,
रोग बहुत से पाल बैठे, इलाज़ बस प्रकाश था ।।
ख़ुशी का अब जोर है, चमक जो हर और है,
जगमग के सैलाब में, कण कण है नहा रहा,
देखो सूरज है आ रहा, अँधियारा है अब जा रहा,
देखो सूरज है आ रहा ।।
-------
लेखनी: अजय चहल 'मुसाफ़िर'
17 सितम्बर 2016
समुन्द्र-तल से 20,000 मीटर ऊपर, दिल्ली, भारत

गुरुवार, 8 सितंबर 2016

चुप

वो कहते हैं, कि क्या हम कहें,
कुछ भी तो कहने को नहीं है;
मगर पास उनके,
कोई वजह चुप रहने को भी नहीं है ।।

सो कुछ भी कहते नहीं,
और चुप भी रहते नहीं ।।

पर उनकी हंसी बड़ी गुस्ताख़ है;
उनकी तरह छुपाती नहीं,
कह देती हर बात है ।।

अब उलझन ये है,
कि उनको भी नहीं पता,
वो क्या कहना चाहते हैं।
पर इतना ख्याल जरूर है उन्हें,
वो क्या छुपाना चाहते हैं ।।

जाने ये बात, वो क्यूँ नहीं जानते,
कि बेजुबां नहीं होते कभी, बंद लब,
दिल की बात, मुस्कान कह देती है सब ।
लाख संभालें, सँभालने वाले,
आँखें हमेशा कह देती हैं, हर बात,
क्योंकि, लबों से बेहतर जानती हैं वो,
तेरे बेचैन दिल के हालात ।।

इसलिए कोशिश ना कर, कुछ ना कहने की,
फितरत नहीं तेरी, चुप रहने की ।
कुछ कहा कर, सब सुना कर,
दिल की बातों को तू गुना कर ।।

'मुसाफ़िर' की इतनी बात जान ले,
खुद को जरा पहचान ले;
नहीं कभी खुश रहेगा,
गर दिल तेरा चुप रहेगा ।।
बस इतना सा है स्वास्थ्य,
थोड़ा बेबाकपन और हास्य ।।
------

लेखनी: अजय चहल 'मुसाफ़िर'
8 सितम्बर 2016
चेन्नई, भारत

शनिवार, 3 सितंबर 2016

ख़ूबसूरत

मैंने कहा, 'ख़ूबसूरत',
तो सबको बस, याद वो बचपन आता है,
जिसे, ना कोई दिल कभी भुलाता है ।
वो कांच की गोलियाँ, मस्तानों की टोलियाँ,
और पत्थरों को समेटती झोलियाँ,
याद करने को जिन्हें, बड़ा जी चाहता है।
पर रफ़्तार पकड़ती जिन्दगी में,
जाने क्यूँ, वो बच्चा कहीं गुम सा हो जाता है।।

मैंने कहा, 'ख़ूबसूरत',
तो शायद, याद उन्हें थी आई जवानी,
नखरे वो सारे, जिनकी थी कभी, दुनिया दीवानी।
उनकी बेबाक हंसी और बोलती मुस्कानें,
जिनकी शिकार बनी थी, जाने कितनी जानें।
पर यकीन उन्हें आज भी नहीं,
पूछ रहे थे मुझसे ही, नाम उन किरदारों के,
जिनकी कभी, ख़ुद ही लिखी थी कहानी ।
और भला क्या कहता मैं,
कहा मैंने,
"पूछो एक बार तो, अपने भी दिल से भला,
ताल मिलाकर संग तुम्हारे, कौन कितने क़दम चला।"
शायद, दुनियादारी और इसकी जिम्मेदारी,
रंग सब छीन लेती है,
भोले चेहरे और मासूम दिलों के बदले में,
चिरस्थायी और गुमसुम सी, समझदारी क्यूँ देती है।।

मैंने कहा, 'ख़ूबसूरत',
तो याद वो पल आते हैं,
भूल कर भी जो, कभी ना भूलाये जाते हैं।
महफ़िल वो यारों की,
बैठक और चुबारों की।
जिक्र उन दास्तानों का, फिक्र उनके बहानों का,
क्या कहें उन जमानों का, भरोसा उन अनजानों का ||
हैरान हूँ, क्यूँ छूट गये, जो हाथ बड़े मजबूत थे,
महफ़िल से क्यूँ उठ गये, जो मेरे साये के सबूत थे।
साथ बैठ जो हँसते थे और हुनर भी जिनके सस्ते थे,
क्यूँ जता रहे थे आज हमें, ऊँचा रेट अपनी दुकानों का,
शायद उम्र से भी भारी है, भरम बड़े मकानों का।।

मैंने कहा, 'खूबसूरत',
तो हँसी उनके लबों पे थी,
"क्या-क्या करूँ, मैं अब याद,
याद ना रहती, अब कोई बात।"
इतना कह के वो चुप हो गये,
सारी गुजर गई, पर जाने किधर गई,
बीते कल की उस भूलभुलिया में खो गये।।
मैंने जो हाथ छुआ, तो लबालब हुई उनकी आँखें,
बोले, "सुनो बेटा",
"जिन्दगी भर बस दौड़ थी,
भूख थी और होड़ थी।"
इक पल को भी ना खुद को संभाला।
अब सोचता हूँ, क्यूँ इतना कमाया,
ताउम्र जिनका रहा, उन्हीं ने अब किया पराया,
दोष किसी को क्या दूं, जो छोड़ रही है साथ अब काया।
काश मेरा दिल बच्चा ही रहता,
तो आज तुमसे ये ना कहता,
जो सुन्दर था, सब मेरे अन्दर था, फिर क्यूँ छोड़ा मैंने,
जाने खुद के ही कितने सपनों को तोड़ा मैंने।
हर दम, हर पल, धुक-धुक रही, चारों और बस शोर था,
बस इतना सा गम है 'मुसाफ़िर',
"जा रहा हूँ कोई और बनकर,
पर आया मैं कोई और था ।।"

 ------------
Watch the video on youtube (click on the link):
https://goo.gl/bza5m3

For audio only, click the link below:
https://soundcloud.com/ajay-chahal/khoobsoorat
-------------
लेखनी: अजय चहल 'मुसाफ़िर'
3 सितम्बर 2016,
चेन्नई, भारत


सोमवार, 29 अगस्त 2016

कश्मीर हमारा है


कश्मीर हमारा है और कश्मीरी भी हमारे हैं;
अमन के दुश्मन उन्हें तुम जानो,
जो बता रहे हमें न्यारे हैं।

भले एक ने पहनी फेरन (कश्मीरी लिबास),
और दूसरा है वर्दी में;
बेटे दोनों भारत माँ को, अपनी जान से भी प्यारे हैं।

हो रहा ये हंगामा क्यों, क्यूँ है तांडव यूँ मच रहा;
कब होगी बंद बोली लगनी, पत्थर लिए इन हाथों की;
उन होनहार और बेकसूर बेटों की,
चिंता में हमवतन सारे हैं।

मत आना बहकावे में, उन घात लगाये गिद्दों की;
मुश्किल की इन घड़ियों में,
कुछ मीठे बोल और नम आँखों के सहारे हैं।

बहुत कोशिश की उस जलजले ने, 
उम्मीदें हमारी डुबाने की;
हाथ बढ़ा हर हिन्दुस्तानी का, 
तो फिर आबाद, डल के किनारे हैं।

मत मानो, इक तरफ़ा है ये रिश्ता, इस सरजमीं से;
उम्मीद है तुमसे हमें जितनी, 
उतने ही हम पर हक तुम्हारे हैं।

उनकी तरह दुश्मनी गर निभाते हम,
तो लाहौर की गलियाँ ना रहती यूँ आबाद;
गिने ना जाते उनसे जख्म, गर हम इरादा करते,
शुक्र करो, कि हम मोहब्बत के मारे हैं।

लो सुन लो आज तुम, 
इस वतनपरस्त ‘मुसाफ़िर’ की जुबां;
कलियों की खूशबू तो है ही,
महकते इस चमन के, सब फूल भी हमारे हैं;
याद रहे,
कश्मीर तो है ही,
LoC के दोनों और के, कश्मीरी भी हमारे हैं।।
--------
जय हिन्द !! भारत माता की जय !!
-----------
Listen it here:
https://soundcloud.com/ajay-chahal 
-----------

लेखनी: अजय चहल ‘मुसाफ़िर’
29th Aug 2016

रविवार, 14 अगस्त 2016

15 तारीख


भारत की जनता ने हक था अपना छीना,
तारीख थी 15 और अगस्त का महीना |
सदियों की गुलामी में, मुश्किल था जीना,
तोड़ी थी जंजीरें, लाखों ने देकर खून-पसीना |
भगत सिंह, चंद्रशेखर और सुभाष जैसा, खोया था नगीना,
यादों में रखना जरूर, वो 15 तारीख और अगस्त का महीना ||

जाना पड़ा था, जब उन्हें छोड़कर,
वो उम्र भर का बैरी दे गये,
दो हिस्सों में हमें तोड़कर |
पर लोहपुरुष ना विचलित हुए,
तन दिया मेरे वतन को,
जाने कितने टुकड़े जोड़कर |
कुछ थे बेचारे, कुछ थे पुचकारे,
कुछ को लाये बांह मरोड़कर |
कुछ का टूटा भ्रम बाद में,
पड़ोसी ने जब डोर-बेल बजाई, छूट गया उनका पसीना,
याद उन्हें आती होगी, वो 15 तारीख और अगस्त का महीना ||

70 साल हैं गुजर गये, जाने वो दिन किधर गये,
आज़ादी का बस ढिंढोरा है, क्यूँ हाथों में आज भी कटोरा है ?
 बच्चा, बुड्ढा, जवान, किसान, हर कोई चिल्लाता है,
भूखा पेट, ऊँचा रेट, बंजर खेत, भूला हमें 'भाग्य-विधाता' है ?
मत लो इम्तिहान हमारा, हमें औकात याद दिलाना आता है,
छोड़े हैं, पर भूले नहीं, हमें हर हथियार चलाना आता है,
तुच्छ ना जानो हमें हुजूर, शहजादों के महल गिराना आता है |
पर उम्मीद जगी है आज उनसे,
लाल किले पर ठोक रहे हैं, जो 56 इंच का सीना,
इरादों में हरदम रहे, वो 15 तारीख और अगस्त का महीना ||

मौका मिला है, सो चूक ना जाना,
कुर्बानी उन वीरों की, सस्ती नहीं गवांना |
लाख हो मुश्किल, पर नहीं असंभव,
गर प्रयास जरा-सा, हर हाथ करेगा,
अपने भारत को विश्व-गुरु बनाना |
सहमे सहमे बहुत जी लिए, अब और सब्र का घूँट नहीं पीना,
तिरंगा फेहराना, जश्न मनाना, पर मत भुलाना,
वो 15 तारीख और अगस्त का महीना ||

जय-हिन्द !!
स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं !!

Video link: https://goo.gl/xrTWeO
----
लेखनी : अजय चहल 'मुसाफ़िर'
15 अगस्त 2016
चेन्नई, भारत 


मंगलवार, 2 अगस्त 2016

अनजाना

जब हुआ था, आँखों से ओझल वो,
तो कहा बहुत बार मुझसे, इन नैनों की नमीं ने,
पर दिल ने उसे कभी बेवफ़ा न माना।
पर अब, जब से उसकी नज़र पड़ी है इधर,
जानें क्यूँ लगे है,
उसका अक्श भी और आभास भी,
उसकी बेरुखी-सा ही अनजाना।।

शायद वक़्त का तकाज़ा है,
या यूँ कहूँ कि वो माहिर थे,
दिल का हाल छुपाने में,
जाने खोट रहा हमारी समझ में,
या भूल हुई उनसे, बताने में,
कहीं अधूरा रह गया, उनका परिचय हमसे,
जानकर या अनजाने में,
इसीलिए आज, हमसे ना गया वो पहचाना,
और उसका अक्श भी और आभास भी,
लगे है उसकी बेरुखी-सा ही अनजाना।।

मैं तो साफ़ दिल था,
उनका ख्याल आया, सो उन्हें कह दिया,
फैसला ये उनका था,
जो हमें अपना कह पुकारा,
इस दिल ने उनके शब्दों को सच ही माना,
होश गवां बैठे हम, भूल गए थे सारा जमाना,
बस चंद लफ़्ज क्या लिखे 'मुसाफ़िर',
लोग कहने लगे हैं तुझे दीवाना,
बड़ा मुश्किल रहा इस जिगर पे,
उनका आना और आकर यूँ चले जाना,
शायद इसीलिये,
था जो शख्स बड़ा जाना-पहचाना,
अब उसी का अक्श भी और आभास भी,
लगे है उसकी बेरुखी-सा ही अनजाना।।

---
लेखनी - अजय चहल 'मुसाफ़िर'
2 अगस्त, 2016
चेन्नई, भारत

रविवार, 17 जुलाई 2016

सच्ची कविता

होती ही नहीं, हो ही नहीं सकती;
कोई कविता सच्ची, आपने सोचा कभी?
मुझे भी लगा, बड़ी जोर से यही झटका,
जब मैं ढूंढ रहा था, अच्छाई कविता में;
झूठ नहीं थी ज़रा भी,
पर नहीं मिली सच्चाई कविता में।।

वहां कल्पना मिली, बस कोरी कल्पना;
सुन्दर लिबास में, प्यारे अहसास में,
तृप्ति और प्यास में, अंदाज़े खास में,
जैसे,
बहुत दूर थे जो, लिखना चाहा उन्हें पास में;
पर हमजोली को देखा, चाँद बने, आकाश में।।

अब सवाल ये है, प्रेरणा बड़ी या कल्पना,
दिल अज़ीज़ को हमेशा सबसे अच्छा माना,
खूबियों को उसकी, अपरिमित ही जाना,
सच को नकारा, पर कल्पित को पहचाना,
क्योंकि,
प्रेरणा जब तक न बिशरे, शब्द में जान होती है,
कल्पना के छीटों से भी, सच की शान होती है,
इसीलिए, कविता हमेशा कवि से जवान होती है।।

सच नहीं हो सकता, इतना आकर्षक;
वो तो अक्सर खुश्क सा होता है,
चुभता है दर्शक नैनों में,
पहले सफ़ेद बाल की तरह,
हटता ही नहीं आगे से,
उस 'बिछड़े' नाम की तरह।
इसीलिए,
सच मुश्किल हो जब,
कविता बदल लेती है अपना पथ,
हमेशा सोचे-समझे अंजाम की तरह।।

कवि से हमेशा एक कदम आगे रहती है,
दास्ताँ-ऐ-दिल पे भारी, हर शब्द सहती है,
बहुत मुखर हो कर भी, कुछ नहीं कहती है,
अम्बर भर समेट कर भी, बाँझ ही रहती है,
'मुसाफ़िर' का हाल, कलम कैसे समेटे भला,
शायद भावगंगा उसकी बहुत गहरे बहती है।।

--
लेखनी - अजय चहल 'मुसाफ़िर'
17 जुलाई, 2016
चेन्नई, भारत

शुक्रवार, 17 जून 2016

कहूँ या ना कहूँ


ये उस गुजरे दौर की कहानी है,
जब ख़्वाब और उलझन का जोर था,
और हम इक मूर्त के दीवाने थे।

पर अब बदले दौर में, ये कहानी,
कुछ कहनी है, कुछ छुपानी है।

दिल तो चिल्लाता है, खोल दे हर पन्नें का राज,
पर मेरे बंधन फुसफुसाते हैं, कहूँ या ना कहूँ।।

उस सफ़र की दास्ताँ है,
जो इक हमसफ़र की बदौलत थी।
लाली बन गयी है अब, इक मांग की,
उसकी मोहब्बत की जो दौलत थी।

बैठ कर सोच भी लेता 'मुसाफ़िर',
पर मौका ना मिला, हाँफती राहों में,
अब जब धुंधला सा नज़र में है वो,
तो सम्भली हुई धड़कनें मुश्किल में हैं,
कुछ कहूँ या ना कहूँ।।

ऐसा नहीं है, कि ओझल था वो,
बस ज़रा नज़र में ना था।
खुली आखों से बेशक नदारद था,
पर बंद पलकों में वक़्त-बेवक़्त,
उसकी खुशनुमा यादें, अक्सर .....बस।
सोचता हूँ, ये सब कहूँ या ना कहूँ।।

चलो छोड़ो, ..
इस राज को राज ही रहने देते है,
और चुप रहकर, खुद ही को सब कह लेते हैं।

मेरा मर्म कहता है कि,
ये दास्ताँ एक-तरफ़ा तो ना होगी,
अब उनको भी तो कुछ कह लेने देते हैं।

पर क्या पता, मेरे जैसे ही बंधन,
उनकी जुबाँ पर भी होंगे...या ना होंगे?
तब तो शायद,
अनकही ही रहेगी ये दास्ताँ,
गर वो भी हमें याद कर के,
लंबी सांस संग, आहें ले कहेंगे,
कि कुछ कहूँ या ना कहूँ।।
.....
ओ...हो.......
कुछ कहूँ या न कहूँ।।
......
दिल परेशान मेरा, पूछे कब तक चुप रहूँ।।
............
--
लेखनी - अजय चहल 'मुसाफ़िर'
चेन्नई, भारत



बुधवार, 3 फ़रवरी 2016

बचपन और पचपन


बात बचपन की हो या
बात पचपन की हो;
सब किस्से वही पुराने हैं,
तेरे हिस्से बस तराने हैं ||

बहुत होड़ थी उस दौर में, दोस्त नए बनाने की,
अब आदत घर कर गयी है, रिश्ते सब भुलाने की |

बड़ा शौंक था, हमें चौंक का,
जहाँ रोज़ नयी बहार थी |
कंचे थे, गुल्ली थी, घरोंदे थे,
और धूल फांकती सांसों की कतार थी |
पर जब गुजरा आज उधर से मैं,
बस सन्नाटे की भरमार थी |

क्योंकि चले गए वो सब, अपनी भूखें मिटाने को,
सिर्फ़ उदरों का सवाल न था, तमन्नाएँ थी महल बसाने की |

मुझ संग बड़े हो गए थे, मेरे खिलौने भी,
मिट्टी वाली ईंटें अब, बन रही थी सोने की,
अनजान थे, पर अब दीर्घ आयु हैं,
मेरे हर्ज़ और फ़र्ज,
होंसले और मर्ज़,
हिस्से और क़र्ज़ |

पहले नींद थी और अब घुटने,
बिस्तर न छोड़ने के ख़ूब बहाने हैं,
बात बचपन की हो, या पचपन की,
सब किस्से वही पुराने हैं,
मेरे हिस्से बस तराने है ||

--------
लेखनी - अजय चहल 'मुसाफ़िर'
चेन्नई, भारत--------


बुधवार, 20 जनवरी 2016

ਏਕ ਫੌਜੀ ਦੀ ਕਹਾਨੀ - ਬਚਪਨ, ਜਵਾਨੀ ਤੇ ਕੁਰਬਾਨੀ


ਰਾਤਾਂ ਨੂੰ ਮੈਂ ਸੋਯਾ ਨਹੀਂ, ਕੇਹੜਾ ਦਿਨ ਸੀ ਜਦੋਂ ਮੈਂ ਰੋਯਾ ਨਹੀ |
ਦੂਧ ਪਿਯਾਂਦੀ, ਪਾਲਣਾ ਹਿਲਾਂਦੀ, ਗਲਾਂ ਲਾਂਦੀ ; ਮਾਂ ਮੇਰੀ,
ਪਰ ਮੈਂ ਚੁਪ ਹੋਯਾ ਨਹੀਂ, ਰਾਤਾਂ ਨੂੰ ਮੈਂ ਸੋਯਾ ਨਹੀਂ ||੨||

ਚਾਚੀ ਤੇ ਤਾਯੀ ਵੀ ਆਉਂਦੀ, ਮੇਰੀ ਮਾਂ ਨੂ ਸਮਝਾਂਦੀ;
ਲਗੀ ਹੈ ਮੁਂਡੇ ਨੂੰ ਨਜ਼ਰ, ਤਾਹੀਂ ਤੇਰੀ ਲੋਰੀਯਾਂ ਹਨ ਬੇਅਸਰ |
ਮਾਂ ਪਝੀ ਜਾਉਂਦੀ, ਇਕ ਦੀਵਾ ਚੂਕ ਲਾਉਂਦੀ,
ਲੇਕੇ ਵਾਹੇਗੁਰੂ ਦਾ ਨਾਂ, ਮੇਰੇ ਲਈ ਅਰਦਾਸਾਂ ਪਾਉਂਦੀ |
ਕਬੂਲ ਸੀ ਹੋਈ, ਜੀਵੇਂ ਜਾਦੂ ਸੀ ਕੋਈ;
ਰਾਤੀਂ ਸੋਯਾ ਹੀ ਨਹੀਂ, ਹੁਣ ਤਾਂ ਮੈਂ ਔਰ ਰੋਯਾ ਵੀ ਨਹੀਂ ||੨||

ਫ਼ੇਰ,
ਬਚਪਨ ਗੁਜ਼ਰਾ ਤੇ ਆਯੀ ਜਵਾਨੀ, ਲਗਿਯਾਂ ਬਣਨ ਹੁਣ ਕੋਈ ਹੋਰ ਕਹਾਨੀ;
ਮੇਰੇ ਹੀ ਬੇਂਚ ਤੇ ਓਹ ਬਹਂਦੀ ਸੀ, ਬਸ ਮੈਨੂ ਤਾਕਦੀ ਰਹਂਦੀ ਸੀ;
"ਤੂੰ ਸੁਪਣੇ ਚ ਆਉਂਦਾ, ਮੈਨੂ ਬੜਾ ਸਤਾਉਂਦਾ", ਬਸ ਇਨ੍ਨਾ ਹੀ ਕਹਂਦੀ ਸੀ |
ਓਹਦੀ ਅਖਾਂ ਦਾ ਨੂਰ, ਮਿਠੀ ਗਲਾਂ ਦਾ ਸੁਰੂਰ, ਓਹ੍ਹੋ !!
ਰਾਤਾਂ ਨੂੰ ਮੈਂ ਸੋਯਾ ਨਹੀਂ, ਧੜਕਦਾ ਦਿਲ ਚੁਪ ਹੋਯਾ ਨਹੀਂ ||੨||

ਮਾਪੇ ਵੀ ਸਮਝ ਗਏ ਸੀ, ਪੜ੍ਹ ਮੇਰੀ ਨਬਜ਼ ਗਏ ਸੀ;
ਜਦ ਓਹਨੂੰ ਬਿਆਹ ਕੇ ਲਾਏ, ਕੰਜਰ ਯਾਰਾਂ ਨੇ ਬੜੇ ਰੋਲੇ ਪਾਏ |
ਲਿਪਟੀ ਸੁਰਖ ਲਿਬਾਸ਼ ਚ ਓਹ ਸਾਮਣੇ ਮੇਰੇ,
ਤਾਹੀਂ ਉਸ ਰਾਤ ਵੀ ਮੈਂ ਸੋਯਾ ਨਹੀਂ,
ਧੜਕਦਾ ਦਿਲ ਫ਼ੇਰ ਚੁਪ ਹੋਯਾ ਹੀ ਨਹੀਂ ||੨||

ਫ਼ੇਰ,
ਉਸ਼ ਰੋਜ਼, ਇਕ ਚਿਠੀ ਸੀ ਆਈ, ਭਾਰਤ ਮਾਂ ਨੇ ਸੀ ਮੈਨੂੰ ਆਵਾਜ਼ ਲਗਾਈ;
ਮੇਰੀ ਬਿਲਖਦੀ ਹੂਰ, "ਮੁੜ ਕੇ ਆਵਾਂਗਾ ਜ਼ਰੂਰ"; ਕਹਕੇ ਮੈਂ ਵਰਦੀ ਸੀ ਪਾਈ |
ਮੇਰੀ ਮਾਂ ਮਜ਼ਬੂਰ, ਜਿਹਦੀ ਅਖਾਂ ਦਾ ਨੂਰ, ਨਿਕਲ ਗਯਾ ਸੀ ਦੂਰ,
ਰਾਤਾਂ ਨੂੰ ਫ਼ੇਰ ਕਦੇ ਓਹ ਸੋਈ ਨਹੀਂ, ਗੁਜ਼ਰਿਆ ਨਾ ਇਕ ਦਿਨ ਜਦੋਂ ਓਹ ਰੋਈ ਨਹੀਂ ||੨||

ਬਸ ਕਾਗਜ਼ਾਂ ਤੇ ਲਕੀਰਾਂ ਓਹ ਖੀਚ ਗਏ ਸੀ,
ਬਾਰਡਰ ਦੇ ਤਾਰ, ਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਹਥਿਆਰ, ਦੋਵੇਂ ਪਾਸੇ ਹੁਣ ਬਿਕ ਗਏ ਸੀ |
ਓਹ ਨਾਸ਼ਤਾ ਕ਼ਾਬੁਲ ਚ, ਲੰਚ ਲਾਹੌਰ ਚ ਤੇ ਡਿੰਨਰ ਦਿੱਲੀ ਆਕੇ ਕਰਦੇ ਨੇ,
ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਬਿਰਯਾਨੀ ਦਾ ਬਿਲ, ਇਹ ਫ਼ੋਜੀ ਆਪਣੀ ਜਾਂ ਦੇਕੇ ਭਰਦੇ ਨੇ |
ਹੈਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਲਈ ਜੋ ਸਫ਼ਲ ਮਿਸ਼ਨ, ਕ਼ੀਮਤ ਚੁਕਾਂਦੇ ਫ਼ੋਜੀ ਦੇਕੇ ਆਪਣੇ ਜਿਸ਼ਮ |

ਓਹ ਬਸ ਟ੍ਵਿਟਰ ਤੇ ਸ਼ੋਕ ਜਤਾਂਦੇ ਨੇ; ਸਾਡੇ ਮਾਪੇ, ਪੂਤ ਦੇਕੇ ਲਾਸ਼ਾਂ ਪਾਉਂਦੇ ਨੇ |
ਸ਼ਹੀਦਾਂ ਦੀ ਬੋਲੀ ਓਹ ਲਖਾਂ ਚ ਲਾਉਂਦੇ ਨੇ, ਬੈਟ-ਬਾਲ ਜਿਥੇ ਕਰੋੜਾਂ ਕਮਾਂਦੇ ਨੇ,
ਸੂਨੀ ਕੋਖ਼, ਬੇਵਾ ਫ਼ੋਜਨ, ਲਾਵਾਰਿਸ਼ ਜਵਾਕ;
ਹੁਣ ਰਾਤਾਂ ਨੂੰ ਸੋਂਦੇ ਨਹੀਂ, ਕੇੜ੍ਹਾ ਦਿਨ ਹੈ ਜਦੋਂ ਓਹ ਰੋਂਦੇ ਨਹੀਂ ||੨||

ਲਖਾਂ ਜਿੰਦਗਾਨਿਯਾਂ ਤਬਾਹ ਹੋਈਯਾਂ, ਪਰ ਵੋਟਾਂ ਦੇ ਪੁਜਾਰੀ ਕਿਸਦੀ ਸੁਣਦੇ ਨੇ,
ਦੋਵੇਂ ਤਰਫ਼ ਨਯਾਰੇ ਹੈਂ, ਪਰ ਬਸ ਖੋਖਲੇ ਨਾਰੇ ਹੈਂ;
ਕਬਰਾਂ ਦਿਯਾਂ ਚੀਖਾਂ ਵਿਚ,
ਮੈਂ ਰਾਤ ਭਰ ਸੋਯਾ ਨਹੀਂ, ਕੇਹੜਾ ਦਿਨ ਜਦੋਂ ਮੈਂ ਰੋਯਾ ਨਹੀਂ,
ਚੁਪ ਤਾਂ ੪੭ ਤੋਂ ਆਜ ਤਕ ਇਕ ਦਿਨ ਭੀ ਮੈਂ ਹੋਯਾ ਨਹੀਂ |
ਮੈਂ ਰਾਤ ਭਰ ਸੋਯਾ ਨਹੀਂ, ਕੇਹੜਾ ਦਿਨ ਜਦੋਂ ਮੈਂ ਰੋਯਾ ਨਹੀਂ ||੨||

(Youtube link to video)
--
ਲੇਖਨੀ - ਅਜਯ ਚਹਲ, ਮਦ੍ਰਾਸ




   



बुधवार, 11 नवंबर 2015

मैं पैसा हूँ


मत उलझो कि मैं कैसा हूं ?
मैं तो बस मेरे ही जैसा हूं।

मृत् कंकाल सी देह या हो फैला उदर,
कारण मैं ही हूँ, कहो यमराज का भैंसा हूँ !
भूल हुई है मानव तुझसे,
मेरे अक्श को तन देकर,
भूल गया जो तू खुद को भी,
ना दानव हूँ, ना ही ईश्वर,
बस चकाचोंध में, तेरी छाती रौंदती,
माया की काया जैसा हूँ,

ये चिर पहेली ना बुझेगी, तुझसे,
कि मैं कैसा हूँ, क्योंकि,
मैं तो बस पैसा हूँ ।
बस मेरे ही जैसा हूं।।

-------
लेखनी - अजय चहल 'मुसाफ़िर'
चेन्नई, भारत

शुक्रवार, 3 मई 2013

जी भर के देखूं


उसे जी भर के देखूँ, तो जी ना भरे ;
बेचैन दिल ये, जाने क्या क्या करे I I

वो जुल्फें ज्यों ज्यों सुलझती गयी ,
उम्मीदें मेरी उलझती गयी I

हरियाली में यूँ थी, वो बदन को लपेटे ;
मुट्ठी में ज्यों थे, हम साँसें समेटे I

इक हाथ कंगन, इक हाथ खाली;
यूँ वो कातिल अदा, मुस्कुराने वालीI

चुप शर्मीली आँखों व बोलते झुमकों का वादा ;
मुलाकात वो छोटी, पर यादें थी ज्यादा I I

उसे जी भर के देखूँ, तो जी ना भरे ;
बेचैन दिल ये, जाने क्या क्या करे I I

------
लेखनी - अजय चहल 'मुसाफ़िर'
चेन्नई, भारत


बुधवार, 27 मार्च 2013

कि होली है आज


सब गुनाहों को कर माफ़,
आओ लग जाओ गले,
के होली है आज...

चहेरे पे पड़े ये तेवर,नहीं है तेरे जेवर,
तेरी मुश्कान पे कर ले तू नाज,
के होली है आज.....

रंगीन समां है, रंग जमा है,
दे दे अपनी धडकनों का तू साथ,
के होली है आज....

महक बिखरी है हर ओर,कर ले फूलों की बात,
खिलखिला ले तू भी,
के होली है आज....

कल को भूल जा तू, ना कर तू कल की आस,
जी ले इसी पल में ये जीवन,
के होली है आज....

जल रही है होली वहां, ढूंढ ले अपना हमजोली यहाँ,
गर भूल गया खुद को तू, याद रखेगा तुझे ये जहाँ,

मौका है बदल ले अपना लिबास,
के होली है आज....
के होली है आज....
----------
लेखनी - अजय चहल 'मुसाफ़िर'
 

सोमवार, 21 नवंबर 2011

किनारा - समुन्दर का


था वो  किनारा समुन्दर का ;
पर  लगा नज़ारा मेरे अंदर का,  तेरे अंदर का I I

जितनी नज़र, बस उतनी खबर;
ना और पता समुन्दर का ,
ना और पता मेरे अंदर का, तेरे अंदर का I

बेचैन लहरें वो समुन्दर की ;
लगी मुझे मेरे अंदर की ,तेरे अंदर  की I

 एक पल को बढती , दूजे पल को घटती;
जैसे थी तमन्ना मेरे अंदर की , तेरे अंदर  की I

आगे बढ़ी तो सब कुछ पास , पीछे  हटी तो फिर खाली हाथ;
है  यही नज़ारा मेरे अंदर  का ,तेरे अंदर का I

था वो  किनारा समुन्दर का ;
पर  लगा नज़ारा मेरे अंदर का,  तेरे अंदर का I I

वहां मैंने कुछ लकीरें खींची ,तो मुस्कुरा उठा तेरा चेहरा ,
मुस्कुराने लगा मैं जो देख तुझे ,
तोड़ मेरी आँखों का पहरा ,पहुंचा वहां किनारा समुन्दर का I
पर नहीं बदला नज़ारा मेरे अंदर का ,
रुख जो हो चुका था तेरे अंदर का ,मेरे अंदर का I I

है अथाह  गहरा, अकूत आबाद ,
पर है इक किनारा, समुन्दर का I
चाहे कितना भी हो पास , पर फिर भी बेदम भूख ;
शायद नहीं किनारा मेरे अंदर का ,
शायद  नहीं किनारा तेरे अंदर का I I

था वो  किनारा समुन्दर का ;
पर  लगा नज़ारा मेरे अंदर का,  तेरे अंदर का I I

---------------
Listen it here:
https://soundcloud.com/ajay-chahal/kinara-samundar-ka-ajay-chahal-at-air-chennai 
-------------------
(Youtube video link)
(Recorded at All India Radio, Chennai)
-----  
लेखनी - अजय चहल 'मुसाफ़िर'


मंगलवार, 8 मार्च 2011

जय जय नारी

यत्र नारिस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता"
कितने सपष्ट शब्दों में व्यक्त है नारी की महत्ता.. 
अथाह सागर है प्रेम का नारी ह्रदय.. 
सदियों से वीरान्गानों की भूमिका में थी नारी..
गुरु नानक देव जी ने फरमाया है-
"सो क्यों मंदा आखिए, जित जन्मे राजान"

माँ ही तो सृष्टी की जननी है..कितनी ताकतवर व सम्मानित होती थी नारी हमारे भारतवर्ष में..
स्वयंवर रचे जाते थे उसके लिए..
परन्तु वक़्त की धार पे नारी का स्तर नीचे फिसलने लगा..
पित्रभगत व पुरुषप्रधान समाज ने अपना अस्तित्व बचाने के लिए लील दिया इस जगतजननी को..
वर्तमान की बात करें तो भारत में 1000  पुरुषों की तुलना में मात्र 933 महिलाएं हैं और हरियाणा में तो सिर्फ 861 ..
आज हम नारी उत्थान का सवांग रचते हैं..
कुपोषण की शिकार पुरुषों की तुलना में महिलाएं ज्यादा हैं..
महिलाओं की निरक्षरता सवाभाविक रूप से कम है..
घरेलू हिंसा,दहेज़ हत्या,यौन उत्पीडन,भ्रूण हत्या और भी ना जाने कितने पाप इस पुरूषप्रधान समाज में नारी झेल रही है..
नारी देह को व्यवसाय का रूप दे दिया गया है..

चंद महिलाओं की प्रगति की सुखद हवा में हम क्यों भूल जाते हैं के अधिकांश नारी आज भी पीड़ित है..
तरस रही है वो अपने उद्दार को..
हमारी सोच, विचार,दृष्टि व नियत सब मैली है स्त्री के प्रति..
ऊपर गिनाया गया कोई अपराध किसी पुरुष पर होते सुना है क्या?.
अगर नहीं तो फिर कहाँ प्रगति है मानवीय स्तर पर,इस स्त्री की..

पर इन सब का इलाज भी हम नारी से ही चाहते हैं..
हाँ,बिलकुल सत्य है के इस वक़्त नारी ही नारी का उद्दार कर सकती है..
सोचो व कर डालो बदलाव - मेरे वतन की वीरांगनाओं..

बजा दो बिगुल भेरी..शंखनाद का वक़्त हो चला है..

विज्ञानं की तरक्की तो यहाँ तक पहुँच गयी है की मेरुरज्जु से प्राप्त स्टेम सेल की मदद से संतान उत्पन्न करने के लिए भी पुरुष की जरूरत ही नहीं रहेगी..
एक अनुमान के मुताबिक 2088 तक इस पुरुष प्रधान समाज का स्वरूप बदलकर पूर्णत नारी प्रधान हो सकता है..
मगर प्रयास जरूरी है..आज से और अभी से..---

"नारी से नर, ना नर से नारी,
ताज है व्याकुल, के अब तेरी है बारी,
जय जय नारी...
जय जय नारी.."


-----
लेखनी - अजय चहल

मंगलवार, 1 फ़रवरी 2005

उलझन


जो ना मिलें उनसे, तो सब्र ना हो,
मिलें गर चंद पल, तो खुद की खबर ना हो;

गैर मौजूदगी में, उनके अफसाने सोचते हैं,
सामने आने पे, बयाँ करने को लफ्ज़ खोजते हैं;

कल भी जब उनसे मुलाकात हुई थी,
तो उनकी पसंद-नापसंद पर बात हुई थी;
झटके से कह गए वो ,
कि बमुश्किल उन्हें कुछ पसंद आता है;

उलझ गए हम तो उलझन में,
कि क्या उनकी इस उलझन में, हमारा भी नाम आता है;
इस उलझने -सुलझने के चक्कर में,
पहाड़ सी रात का सवेरा हो जाता है;

कायल थे हम उनकी उलझन के,
क्या कोई फैसला इतनी जल्दी सुनाया जाता है I I 


------
लेखनी - अजय चहल

रविवार, 21 नवंबर 2004

ख्वाब


हर रोज़ एक नया ख्वाब देखता हूँ,
हर ख्वाब में खुद को तेरे साथ देखता हूँ I I

दिन में सैकड़ों चेहरे सामने आते हैं ,
कसम से सभी चेहरे मुझे बहुत भाते हैं ;
क्योंकि -
शायद हर चेहरे में , तुम्हारा ये चेहरा साफ़ देखता हूँ I

हर रोज़ एक नया ख्वाब देखता हूँ,
हर ख्वाब में खुद को तेरे साथ देखता हूँ I I

तुम्हारी ये गोल-गोल नशीली आँखें ,
और पल-पल झुकती पलकें ;
बयां करना तुम्हारा सब कुछ ,
यूँ मुस्कुरा के हलके ;
करीब आती मेरी तबाही ,
इन अदाओं में साफ़ देखता हूँ I

हर रोज़ एक नया ख्वाब देखता हूँ,
हर ख्वाब में खुद को तेरे साथ देखता हूँ I I


--------
 इसे उर्दू में यहाँ पढ़ें:
https://musaafiraana.blogspot.in/2017/08/khawaab.html
-------

लेखनी:
अजय चहल